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Wednesday, 27 February 2008

सूना सूना

चारों ओर उदासी छाई
ओठों पर हरदम है पहरा
घर आँगनअब सूना सूना
घर बाहर की तैयारी ने
माँगा तनमन धन का हिस्सा
जिसे सुनाऊं उसे लगेगा
सुचमुच तोता मैना किस्सा
कोर कसर रह जाय न कोई
पूरी हों अवशेष हसरतें
जोड़ रखा सब दूना दूना
जहाँ कहीं भी गया निमंत्रण
कोई छूछे हाथ न आया
दूर पास के सब रिश्तोंने
अपना अपना रंग जमाया
मिटें लकीरें सब अनाचाही
एक भाव था सबके मनमें
रिश्ता लगे न जूना जूना ।

शहनाई की अनुगूंजों में

हसीं खुशी की अनगिन कडियाँ

पंख लगा सब उडे पखेरू
सन्नाटा बुनती सब घडियाँ
सबने मिलजुल खुशियाँ बाटी
सपनें हुए अधूरे पूरे
सूनापन दुःख ऊना ऊना
[भोपाल:१६ २.08]






Wednesday, 2 January 2008

कहानी

महानगर की अजब कहानी
आम आदमी है अनजाना
जीवन पथ के अथ में जितना
अखरा जितना सूनापन
शोर परसता तीखापन
बुनता प्रतिपल घोरप्रदूषण
महाप्रलय का तानाबाना
सारी दुनिया जब सो जाती
महानगर सो कर उठता
काला धंधा काला सिक्का
भारी असली पर पड़ता
मंत्री सांसद पैसों के घर
सुन्द्रियोंका आना जाना
अपसंस्कृति की ठेकेदारी
महानगर को लगी भली
विज्ञापन की उघरी नारी
महानगर में गली गली
महानगर पैसों का भूखा
अपशकुनी कौवा काना
किसने किसकी नाक काट ली
आँख कान सूजे भौके
किसने किसकी जेब नाप ली
पीछे से कुत्ते भौके
फूटे ज्वालामुखी बमों के
महानगर रहता अनजाना
[भोपाल:2.01.08]

Tuesday, 1 January 2008

गुमसुम रह्त्ती है !

बीच शहर में रहकर अम्मा
गुमसुम रहती है!

चीन जैसी दीवारें
नील गगन छूती मीनारें
दिखें न सूरज चांद सितारें
घर-आगन सब बंद किवारे
ह्हुरी गाँव डगर से अम्मा
पल पल घुलती है!

नंगा नांच देख टी .बी.में।
नोंक झोंक सौहर बीबी में
नाती पोते मुंह लटकाए
सन्नाटा हर दम संनाये
देख देख सब घर में अम्मा
गुपचुप रहती है!

सारी दुनिया लगती बदली
चहरा सबका दिखता नकली
धर्म कर्म सब रखे ताकमें
सबके सब ,पैसा फिराक में
देख न सकती यह सब अम्मा
सच सच कहती है!
[भोपाल:1.1 ०८]

Sunday, 30 December 2007

चिंता

बोल गया कागा मुंडेर पर
शायद घर आयेगा ललना
रोटी रोजी के चक्कर में
देश छोड़ पर देश गया
घर आँगन खलिहान खेत को
'रामभारोसे' सौंप गया
जिससे पूंछो वो ही कहता
सूने खेत गाँव घर अंगना !
जब से गया न चिठिया भेजी
जाने कैसे रहता है?
कब कैसे क्या खाता पीता
किससे सुख दुःख कहता है
आँख फड़क संकेत दे रही
जीवन उसका सुख का झरना !
दिशा दिशा से खबर आ गई
अम्मा मत चिंता करना
ठीक समय से खाना -पीना
बापू का ख्याल रखना
समय समय पर मेघ दूत से
खबर -अतर लेती रहना !
[भोपाल:25.12.07 ]

Friday, 28 December 2007

किसको करूं प्रणाम?

जब जब पहुंचा गाँव
तब तब ठिठके पाँव
किसको करूँ प्रणाम !
जिस आंगन में खेले कूदे
लुक छिप माटी खाई
चप्पे चप्पे पर उसके भी
घास बेशर्म उग आई
आम नीम की छाँव
लूकाछिपी के दाँव
हो गए सब गुम नाम
दादा दादी अम्मा बापू
संगी साथी खोये
बचा न कोई कुटुम कबीला
मौत गमी में रोये
थके किसी के पाँव
जुड़ जाटा था गाँव
धूल में मिला सुनाम !
बदल गयी सब रीति नीतियां
बदल गयी सब रस्में
अपनों से विश्वास उठ गया
रहा न कोई वश में
कठिन समझना भाव
उल्टी बहती नाँव
ले न कोई सलाम !
[भोपाल:30.9.07 ]
में

Wednesday, 26 December 2007

घर कब आयोगे?

पसोपेस में पड़े हुए क्यों ?
जाते जाते दे दो जबाव
फिर कब घर आओगे भैया ?
जितने दिन तुम रुके गाँव में
सुख का पारावार बहा
इस तोले से उस तोले तक
अधर अधर पर नाम रहा
सबका है यहं लाब्बेलुबाव
माँग रहे सब एक जबाव
हरी भरी फसलों ने देखा
यादों में बो दिन आया :
तुमने थामी हल की मुठिया
बापू ने खाना खाया
इस पर सबको नाज़ जनाब
पढ़ लिखकर तुम बने नबाब
सब हैं आतुर मिले जबाव
सुबह शाम जब अलाव जलता
तुम आ जाते बातों में
सपनों की बारात निकलती
तुम छा जाते रातों में
चेहरा चेहरा नचे शबाव
हार गले का बने जबाव
फिर कब घर आयोगे भैया ?
[भोपाल:15.12.07]

Saturday, 22 December 2007

गिलहरी

देश रहा परदेश गया
सभी जगह पर मिली गिलहरी
भूले भटके आँगन में जब आई
सूख रहे दानों पर तब ललचाई
पीछे पड़ गए छोरा छोरी घर के
मार मार कर ढेला तुरत भगाई
जान बचाकर पेड़ चड़ी
मन ही मन में दुखी गिलहरी
रामसेतु की जग में धूम मची है
अमिट निशानी बस अवशेष बची है
खून पशीना दिया गिलहरी ने जो
रेखाओं में वो तस्वीर खिची है
युग बीते युग रीतेंगे
याद दिलाती सबको यही गिलहरी
कटते जंगल देख देख रोती है
आंखों की नींद गई ना सोती है
सोच रही मुथरी पड़ जाय कुल्हाड़ी
उज्जवल भविष्य के सपने बोती है
सांस शेष जबतक वन की
नहीं चुकेगी दुनिया कहे गिलहरी
[भोपाल: 1.12। 07]