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Friday, 24 April 2009

मेरा घर

छूमंतर हो जाय जहाँ पर तन मन बसी थकान
आसपास में बहीं मिलेगा मेरा घर दालान

आम नीम बरगद पीपल की
जहां घनेरी छाँव
जेठ दोपहरी थके पथिक के
रुकें जहाँ पर पाँव
करें बसेरा मिलजुल पंछी गायें गौरव गान

जहां बिसात बिछी सपनों की
लोरी की सौगात
गडी नाल पीढी दर पीढी
बता रही औकात
रहें कहीं भी इस दुनिया में पल पल खीचें ध्यान

माँ चूल्हे की सिकीं रोटियाँ
दादी फेरी छाछ
संबंधों के कोमल किसलय
हरी भरी ज्यों गाछ
खोज खोज कर हारे घर के मिले नहीं उपमान
[व्भोपाल:०२.०६ .०८]

भूल गए हम गाँव

हवा लगी है जबसे शहरी भूल गए हम गाँव

रोजी रोटी के चक्कर में
सारे दिन हम भटके
मंहगाई के गलियारों में
कदम कदम पर अटके
पोर पोर में पगी पीर से हारे तन मन पाँव

चोर उचक्के दिन दोपहरी
करते काम तमाम
तन्त्र समूचा गूंगा बहरा
प्रजातंत्र के नाम
बात बात पर कर आरोपित नहीं चूकता दाँव

कोई नहीं किसी की सुनता
अपने अपने किस्से
भूख प्यास कुंठाएं आतीं
केवल सबके हिस्से
भटक रहीं हैं जिंदा लाशें भूल गयीं निज ठाँव
[भोपाल:२९.०५.०८]

Thursday, 23 April 2009

शुभागमन

बिटिया दामाद का शुभागमन
महक उठा सारा घर आँगन
पूरी बस्ती में खबर उड़ी
घर घर में उछली खीरपुरी
खुशियों के लग गए पंख
स्वागत में बज उठे शंख

कामकाज सब हुए ठप्प
सब ठौर हो रही गप्प गप्प
हैरान हुई दे दे दस्तक
तिल भर सिकन न आई मस्तक
मस्ती की छन रही भंग
टली बिदा उमड़ी उमंग
[भोपाल:१०.१० .०७]

Friday, 20 March 2009

ढाई आखर सार

रंगों का त्यौहार
खुशियों का उपहार
गली गली में जली होलियाँ
हाथ हाथ में भुनी बालियाँ
तैयार हुए गुजिया पकवान
घर बखरी में सजीं थालियाँ
खुले सभी के द्वार
पूरी हों मनुहार
अमराई महुआ बौराया
कोयल भौरा वन हुलसाया
सेमल कोरल पलाश फूले
लाल गुलाल भंग पीआया
लाल लाल संसार
रंगों की बौछार
मोंती होरी धनिया नाचे
फाग ठुमरियां फगुआ बांचें
मन मथुरा तन 'बरसाना'
जन गण मन की खिलती बाछें
ढाई आखर सार
कबीरा उतरा पार
[ भोपाल : २०.०३.०९]

Saturday, 29 November 2008

बंधुआं मजदूर

अंग अंग पीडा जग क्या जाने
मै कितना मजबूर
मै बधुआ मजदूर

भालू बंदर जैसा हमको
मालिक रोज़ नचाता
बात बात में गाली देता
हरदम रौव जमाता
तन की चाँदी मन का सोना
आंसू से भरपूर

फटे पुराने कपड़े लत्ते
अंग अंग शर्माए
लगी फफूंदी रोटी सालन
मालिक जब भिज्बाये
अन्खाये सो जाती कुटिया
निदिया भागे दूर
खून पसीने की मेहनत
टुकडा टुकडा में
बाहर कुटिया रोटी



sabkee chhaatee



bheetr



लगीं फफूँदी रोटी सालन
मालिक जब भिजबाये
अन्खाये चाँदी मन कुटिया iyaa न्खाये दूर
चांदी पसीने जो कमाई
टूकडों








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Tuesday, 18 November 2008

क्यों इतराते जय जय राम

उमर बड़ी है कविता छोटी
क्यों इतराते जय जय राम
चलने से पहले तैयारी
अगर नहीं कर पाये पूरी
अधकचरे संसाधन सारे
संकल्पों की मांग अधूरी
मंजिल तक कैसे पहुचोगे
जब सकुचाते जयजयराम

बम बारूद बिछी पग पग पर
बागुड लगी चाटने फसलें
पता नहीं है अपने ही कब
विष बुझे तीर तीखें उगलें
सोच समझ कर ताल ठोकन्ना
सब समझाते जयजयराम

घिसी पिटी भाषा लय स्वर गति
काम नही अब आने वाले
भानुमती के कुनवे की अब
गीत नही है सुनने वाले
पीर पराई ही पीने में
वे सुख पते जय जय राम
[भोपाल १५ नवम्बर २००८ ]

Sunday, 21 September 2008

मछेरा और मछलियाँ


बिन नागा के कुशल मछेरा
रोज़ ताल में जाल बिछाता

मिली विरासत मछुयारे को
आदिकाल से जाल बिछाना
छोटी बड़ी मछरियाँ सोंचे
मुश्किल उससे जान बचाना
काम न आए कोई बहाना
उसको नित बाजार बुलाता

मछुआरे की सूझ -बूझ ने
पेट प्रे में का लक्ष्य चुना है
शकुन्तला दुष्यंत मिलन का
चिर परिचित आख्यान बुना है
कालिदास का अम्र ताराना
सब जग को संदेश सुनाता

मौत एक की नये सृजन की
सदा सौपती आई थाती
रवि किरणों को मिलता जीवन
ज्ब्ब्दीप्क की बुझती बाती
असमंजस में पड़ीं मछरियाँ
मछुआरे का राग न भाता
[भोपाल:इ९.०९.०८]