साँस साँस विश्वास पला
खाँस खाँस उपहास मिला है
जिसने जितना ही सुख चाहा
फाँसफाँस दुःख दर्द मिला है
ज्ञानी ध्यानी सब जग कहता
दुःख सुख जीवन सार मिला है
सर सरिता उपवन उपवन में
प्राणी की धड़कन धड़कन में
जीवन का संदेश मचलता
अंजन आंजरहा अंखियन में
दशों दिशाओं का मन कहता
हँसी खुसी का तार है
कितना भी कुछ कर ले कोई
राजा रंक बचा न कोई
जनम मरण ज्यों भोर सांझ -सा
अंत समय सब दुनिया रोई
पंक्ति पंक्ति कबिरा की कहती
जनम मरण त्यौहार है
[भोपाल:०३.०४ ०८]
Tuesday, 22 July 2008
Saturday, 19 July 2008
मधुर मधुर मुस्कान
शिशु की मधुर मधुर मुस्कान
छोड़ छाड़ सब काम हाथ के
गोद में उसे उठाये
जो सुख जसुदा माँ ने लूटा
झोली में न समाये
शिशु पर देती पूरा ध्यान
गेंद समझकर उसे उछाले
फूटे हसीं फुआरा
प्रसव वेदना की पीड़ा का
भूल जाय दुःख सारा
'कानावाती 'कू-कू कान
चुम्मी गाल गाल पर जड़कर
ढेर वलैयाँ लेती
मचे गुदगुदी जब आँचल में
पल्लू से ढक लेती
मेरा जीवन धन्य महान
[भोपाल:१६.०७.०८]
छोड़ छाड़ सब काम हाथ के
गोद में उसे उठाये
जो सुख जसुदा माँ ने लूटा
झोली में न समाये
शिशु पर देती पूरा ध्यान
गेंद समझकर उसे उछाले
फूटे हसीं फुआरा
प्रसव वेदना की पीड़ा का
भूल जाय दुःख सारा
'कानावाती 'कू-कू कान
चुम्मी गाल गाल पर जड़कर
ढेर वलैयाँ लेती
मचे गुदगुदी जब आँचल में
पल्लू से ढक लेती
मेरा जीवन धन्य महान
[भोपाल:१६.०७.०८]
वो घर
सचमुच वो घर भूँलू कैसे
भूली बिसुरी याद छिपाए
जिस घर का कोना -कोना
असमय आँख मिचीं अम्मा की
फूट-फूट कर रोना -धोना
दुःख विसराया जैसे तैसे
जब जब जैसी हुई जरूरत
सोच समझकर नकशा खीचा
सबने मिलजुल घर आँगन को
खून पसीने से फ़िर सींचा
जुट जाते थे ऐसे -पैसे
चौपाल चौतरा के बाजू में
सीना ताने नीम खडा है
हर मौसम सेवा करने को
पांव अंगदी जमा अड़ा है
रोग न झाँके ऐसे वैसे
[भोपाल: १५०७ .०८]
भूली बिसुरी याद छिपाए
जिस घर का कोना -कोना
असमय आँख मिचीं अम्मा की
फूट-फूट कर रोना -धोना
दुःख विसराया जैसे तैसे
जब जब जैसी हुई जरूरत
सोच समझकर नकशा खीचा
सबने मिलजुल घर आँगन को
खून पसीने से फ़िर सींचा
जुट जाते थे ऐसे -पैसे
चौपाल चौतरा के बाजू में
सीना ताने नीम खडा है
हर मौसम सेवा करने को
पांव अंगदी जमा अड़ा है
रोग न झाँके ऐसे वैसे
[भोपाल: १५०७ .०८]
Monday, 14 July 2008
पुश्तैनी घर
पुरखों का घर एक बट गया हिस्सों में
घर के मुखिया दादा -दादी
सबकी चिंता दादा -दादी
चूल्हा-चौका सबका एक
सबके पीछे दादा -दादी
कभी किसी का कौर बटा न किश्तों में
सब ओर घना अनुशासन था
आँख इशारा शीर्षासन था
सबका दुःख दादा -दादी की
अंतर्पीदा का कारण था
कभी किसी का दुःख न बधां था बस्तों में
मिंची आख दादा -दादी की
बही हवा शक -संदेहों की
जितने मुंह उतने ही चूल्हे
मिती साख दीवारों की
पुश्तेनी घर शेष रहा अब किस्सों में
[भोपाल:०७.०७.०८]
घर के मुखिया दादा -दादी
सबकी चिंता दादा -दादी
चूल्हा-चौका सबका एक
सबके पीछे दादा -दादी
कभी किसी का कौर बटा न किश्तों में
सब ओर घना अनुशासन था
आँख इशारा शीर्षासन था
सबका दुःख दादा -दादी की
अंतर्पीदा का कारण था
कभी किसी का दुःख न बधां था बस्तों में
मिंची आख दादा -दादी की
बही हवा शक -संदेहों की
जितने मुंह उतने ही चूल्हे
मिती साख दीवारों की
पुश्तेनी घर शेष रहा अब किस्सों में
[भोपाल:०७.०७.०८]
Thursday, 3 July 2008
मेरी घर बखरी
सोच समझ मिलजुल पुरखों ने
जिसकी नींव धरी
हर ऋतु में सौगात परोसे
मेरी घर बखरी
कहाँ कहाँ क्या क्या होना है
चौपाल चौतरा चूल्हा -चौका
कहाँ सहेजे घूरा ईंधन
मन्दिर के ढिग तुलसी चौरा
सब हाथों ने दिया सहारा
छत -छाया निखरी
सौपें रातों ने जो सपनें
दिवसों ने साकार कर दिए
उनचास पवन तूफानों में भी
हंसती नंदन नगरी
पीढी दर पीढी को जिसने
कुलपूजा त्यौहार परोसे
नाम-काम इतिहास रच गए
शिलालेख पर टिके भरोसे
आस-पास जनगण गीतों में
यश -गाथा बिखरी
[भोपाल;०२.०७.०८]
जिसकी नींव धरी
हर ऋतु में सौगात परोसे
मेरी घर बखरी
कहाँ कहाँ क्या क्या होना है
चौपाल चौतरा चूल्हा -चौका
कहाँ सहेजे घूरा ईंधन
मन्दिर के ढिग तुलसी चौरा
सब हाथों ने दिया सहारा
छत -छाया निखरी
सौपें रातों ने जो सपनें
दिवसों ने साकार कर दिए
उनचास पवन तूफानों में भी
हंसती नंदन नगरी
पीढी दर पीढी को जिसने
कुलपूजा त्यौहार परोसे
नाम-काम इतिहास रच गए
शिलालेख पर टिके भरोसे
आस-पास जनगण गीतों में
यश -गाथा बिखरी
[भोपाल;०२.०७.०८]
Wednesday, 2 July 2008
जसुदा मैया
आओ तुम्हें बताता हूँ मै
कैसी जसुदा मेरी मैया
तन माटी का दिया सजाती
मन की बाटी रोज़ जलाती
तं की थाती जहां जहां पर
नागा बिना दिया धर आती
रात अमावस अधिनारी में
शरद जुनैया मेरी मैया
मां का अंतस करुना सागर
बात बात में लगे पिघलने
पीर पराई हर लेने को
जब देखो तब लगे मचलने
चलती फिरती तुलसी विरचित
रामायण -सी मेरी मैया
कभी खुरदरे शब्द न आए
अधरों पर ,हाँ,भूले भटके
शब्द शब्द कविता बनते थे
लगते हरदम टटके टटके
नवल धवल वसनों में लगती
हंस गामिनी मेरी मैया
[भोपाल:१५.०८.०७]
कैसी जसुदा मेरी मैया
तन माटी का दिया सजाती
मन की बाटी रोज़ जलाती
तं की थाती जहां जहां पर
नागा बिना दिया धर आती
रात अमावस अधिनारी में
शरद जुनैया मेरी मैया
मां का अंतस करुना सागर
बात बात में लगे पिघलने
पीर पराई हर लेने को
जब देखो तब लगे मचलने
चलती फिरती तुलसी विरचित
रामायण -सी मेरी मैया
कभी खुरदरे शब्द न आए
अधरों पर ,हाँ,भूले भटके
शब्द शब्द कविता बनते थे
लगते हरदम टटके टटके
नवल धवल वसनों में लगती
हंस गामिनी मेरी मैया
[भोपाल:१५.०८.०७]
कामधेनु
मलयानिल कानों में कहती
मेरी अम्मा सोनचिरैया
खात पकड़ते ही अम्मा के
सारा घर गम पीता
जैसे सूरज के ढलते ही
सारा जग तं जीता
अम्मा चलती घर चलता था
घर कश्ती की कुशल खिवैया
बात बतंगड़ जब बनती हो
कैसे दफना देना
सैनन नैनन सब समझाना
क्या है लेना- देना
जो मांगो सो वो देती थी
कामधेनु की वंशज मैया
सम्बन्धों की कुशल चितेरी
पग-पग उन्हें निभाया
जद जमीन तनमन से सिंची
माथे से सदा लगाया
परम्परा की सिरजन हारी
ढल जाती थी झटपट मैया
[०७.०८.०७]
मेरी अम्मा सोनचिरैया
खात पकड़ते ही अम्मा के
सारा घर गम पीता
जैसे सूरज के ढलते ही
सारा जग तं जीता
अम्मा चलती घर चलता था
घर कश्ती की कुशल खिवैया
बात बतंगड़ जब बनती हो
कैसे दफना देना
सैनन नैनन सब समझाना
क्या है लेना- देना
जो मांगो सो वो देती थी
कामधेनु की वंशज मैया
सम्बन्धों की कुशल चितेरी
पग-पग उन्हें निभाया
जद जमीन तनमन से सिंची
माथे से सदा लगाया
परम्परा की सिरजन हारी
ढल जाती थी झटपट मैया
[०७.०८.०७]
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