भला हुआ जो अम्मा तुमने
राह स्वर्ग की पकड़ी
लम्बी बीमारी ने तुमको
बना दिया था ठठरी
सब दुनिया भौचक्की होती
देख दबाएँ गठरी
तन्त्र मन्त्र -लुकमान डाक्टर
सबने छोडी आशा
तन की गाड़ी मन के पहिये
छोड़ चुके थे पटरी
दूभर था खाट छोड़ना भी ,थाम थाम कर लकड़ी
आठ आँसू रोते थे
कुत्ता बिल्ली डेली
घर आँगन बुनता सन्नाटा
तुमको देख अकेली
दशों दिशाएँ अवनी अम्बर
छोड़े हाल पूंछना
तरस गईं थीं बतियानें को
खटिया लेटे लेटे
निखुराते थे बहुएं बेटे ,छुटकी हरदिन झगड़ी
सिखलाया था जिनको तुमने
स्वर्णिम सपने बुनना
छोटा पड़ता था घर आँगन
कमरा अपना अपना
आह कराह खांसना असमय सबको
सबको अखरा करता
निश्चित था डौगी पूसी को
खाना पानी फिरना
जब पहुँचीं आश्रम तुम अम्मा ,मनी दिवाली तगड़ी
[भोपाल:१०.१०.२०१०]
Tuesday, 19 October 2010
Sunday, 30 May 2010
भादो से कह देना
जब सावन सूखा जाय रे
तब मौसम रूठा जाय रे
जी हाँ ,भादो से कह देना
मत तुम मेघों को सह देना
सावन की मजबूरी थी
मानसून से दूरी थी
दिया हवाओं ने धोखा
तैय्यारी अभी अधूरी थी
समझा समझा कर कह देना
वादा करके मत चल देना
ताल तलैया सरिता सूखे
करे प्रदूषण मनमानी
पग पग पर पानी के धोखे
खोटीखरी खबर सुन लेना
सोच समझ कर उत्तर देना
हाथ पसारेखेत खड़े हैं
बीजों के अरमान बड़े हैं
कर देंना तरबतर सभी को
होरी धनिया कर जोड़े हैं
जन गन मन भाषा पढ़ लेना
कजरी की लय स्वर गुण लेना
[बुरहानपुर:बेरिमैदान :०८.०८.०९]तब मौसम रूठा जाय रे
जी हाँ ,भादो से कह देना
मत तुम मेघों को सह देना
सावन की मजबूरी थी
मानसून से दूरी थी
दिया हवाओं ने धोखा
तैय्यारी अभी अधूरी थी
समझा समझा कर कह देना
वादा करके मत चल देना
ताल तलैया सरिता सूखे
करे प्रदूषण मनमानी
पग पग पर पानी के धोखे
खोटीखरी खबर सुन लेना
सोच समझ कर उत्तर देना
हाथ पसारेखेत खड़े हैं
बीजों के अरमान बड़े हैं
कर देंना तरबतर सभी को
होरी धनिया कर जोड़े हैं
जन गन मन भाषा पढ़ लेना
कजरी की लय स्वर गुण लेना
Tuesday, 19 January 2010
गीता के स्वर
जब जब मैंने गीत सुनाया
सुनने वाले झूम उठे
नभ में श्याम घटायें छाईं
सुरभित मंद हवाएं आईं
माटी की सौंधी सौगाते
नभ-थल दशों दिशाएँ लाईं
नवलय नव गति तति नति से
छंद गीत के झूम उठे
जन गण मन के अंतस भोले
मिलजुलकर दरवाजा खोले
करुणा का सगा लहराया
आँसू छलके तनमन गीले
गीतों के अनुबंध सलोने
अतापता सब पूँछ उठे
खुली नींद तनमन से जागे
समय समाज सभी के आगे
माँ के आगे शीश झुकाया
गीतों के बुन डाले धागे
जब जब गीत अद्फ्ह्र पर आया
गीता के स्वर गूँज उठे
[भोपाल:१७.०१.१०]
सुनने वाले झूम उठे
नभ में श्याम घटायें छाईं
सुरभित मंद हवाएं आईं
माटी की सौंधी सौगाते
नभ-थल दशों दिशाएँ लाईं
नवलय नव गति तति नति से
छंद गीत के झूम उठे
जन गण मन के अंतस भोले
मिलजुलकर दरवाजा खोले
करुणा का सगा लहराया
आँसू छलके तनमन गीले
गीतों के अनुबंध सलोने
अतापता सब पूँछ उठे
खुली नींद तनमन से जागे
समय समाज सभी के आगे
माँ के आगे शीश झुकाया
गीतों के बुन डाले धागे
जब जब गीत अद्फ्ह्र पर आया
गीता के स्वर गूँज उठे
[भोपाल:१७.०१.१०]
Tuesday, 17 November 2009
मजबूरी
मैं क्या करूँ बताओ भैया
राज रोग ने भौंका भाला
तन मन सब जर्जर कर डाला
तन्त्र मन्त्र हो गए नपुंसक
रोग हो गया क्रूर अहिंसक
नहीं जेब में बचा रुपैया
दिया उधार सभी ने पहले
भारी व्याज मूल के बदले
हुमां की पूँछ उधारी
बीमारी द्रुपदा की सारी
कोई नहीं उधार दिवैया
चूल्हा देता रोज उलहना
गिरवी धर गए गहना कंगना
मर गया फसलों को लकवा
गिना चुना खेती का रकवा
पड़ा बेचना खेत मडैया
[भोपाल:०९.११.०९]
राज रोग ने भौंका भाला
तन मन सब जर्जर कर डाला
तन्त्र मन्त्र हो गए नपुंसक
रोग हो गया क्रूर अहिंसक
नहीं जेब में बचा रुपैया
दिया उधार सभी ने पहले
भारी व्याज मूल के बदले
हुमां की पूँछ उधारी
बीमारी द्रुपदा की सारी
कोई नहीं उधार दिवैया
चूल्हा देता रोज उलहना
गिरवी धर गए गहना कंगना
मर गया फसलों को लकवा
गिना चुना खेती का रकवा
पड़ा बेचना खेत मडैया
[भोपाल:०९.११.०९]
Sunday, 20 September 2009
हिन्दी का सपना
गंगा-यमुना में नहलाती हिन्दी
रामायण आल्हा सुनवाती हिन्दी
ऊंचा मेरा मस्तक आज हिमालय -सा
सब दुनिया में उत्सव करवाती हिन्दी
अमरीकन भैय्यों की राखी हिन्दी
कबीरा मीरा सूरा की साखी हिन्दी
सोने से सपनों की खीर पकाकर
सब दुनिया को परसे थाली हिन्दी
विश्व धर्म सम्मलेन में गूंजी हिन्दी
सब धर्मों ने तब चूमी थी हिन्दी
सत्य अहिंसा विश्व शान्ति सिखलाने
दुनिया के घर घर घूमीं थी हिन्दी
भारत माता के माथे की बिंदी
आह्वान करती दुनिया को हिन्दी
मिलजुलकर आतंकवाद का खून चूस लो
चीर फाड़ बिखरा दो चिंदी बिंदी
नव नूतन इतिहास रच रही हिन्दी
नए नए उपमान गढ़ रही हिन्दी
विश्व ग्राम कासपना पूरा होगा
ऐसा शुभ संदेश पढ़ रही हिन्दी
[लिटिल रॉक :११.०८.२००३]
---------------------
डालास अमेरिका में अंतर राष्ट्रीय हिन्दी समिति के २००३के लिए लिखित
chir
रामायण आल्हा सुनवाती हिन्दी
ऊंचा मेरा मस्तक आज हिमालय -सा
सब दुनिया में उत्सव करवाती हिन्दी
अमरीकन भैय्यों की राखी हिन्दी
कबीरा मीरा सूरा की साखी हिन्दी
सोने से सपनों की खीर पकाकर
सब दुनिया को परसे थाली हिन्दी
विश्व धर्म सम्मलेन में गूंजी हिन्दी
सब धर्मों ने तब चूमी थी हिन्दी
सत्य अहिंसा विश्व शान्ति सिखलाने
दुनिया के घर घर घूमीं थी हिन्दी
भारत माता के माथे की बिंदी
आह्वान करती दुनिया को हिन्दी
मिलजुलकर आतंकवाद का खून चूस लो
चीर फाड़ बिखरा दो चिंदी बिंदी
नव नूतन इतिहास रच रही हिन्दी
नए नए उपमान गढ़ रही हिन्दी
विश्व ग्राम कासपना पूरा होगा
ऐसा शुभ संदेश पढ़ रही हिन्दी
[लिटिल रॉक :११.०८.२००३]
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डालास अमेरिका में अंतर राष्ट्रीय हिन्दी समिति के २००३के लिए लिखित
chir
Monday, 6 July 2009
सुख दुःख इस जीवन में !
गीतों का श्रृंगार करेंगें
सुख दुःख इस जीवन में
जब से होश सभाला मैनें
माँ ने पाठ पढाया
गिरना उठना आगे बढ़ना
गीता सार बताया
लुका-छिपी का खेल रचेंगें
सुख दुःख इस जीवन में
बापू ने खलिहान खेत में
जगमग ज्योति जलाई
मिलीं विरासत में सौगातें
ज्यों की त्यों लौटाईं
फूंक फूंक कर कदम रखेंगे
सुख दुःख इस जीवन में
जब दुःख आए आँसू पीना
सुख में मत इतराना
राम राम कह सुख 'बनिया 'को
तीते घाव सुखाना
नवगीतों का खाट बुनेंगे
सुख दुःख इस जीवन में
bhopaal ०५.०७.०९]
सुख दुःख इस जीवन में
जब से होश सभाला मैनें
माँ ने पाठ पढाया
गिरना उठना आगे बढ़ना
गीता सार बताया
लुका-छिपी का खेल रचेंगें
सुख दुःख इस जीवन में
बापू ने खलिहान खेत में
जगमग ज्योति जलाई
मिलीं विरासत में सौगातें
ज्यों की त्यों लौटाईं
फूंक फूंक कर कदम रखेंगे
सुख दुःख इस जीवन में
जब दुःख आए आँसू पीना
सुख में मत इतराना
राम राम कह सुख 'बनिया 'को
तीते घाव सुखाना
नवगीतों का खाट बुनेंगे
सुख दुःख इस जीवन में
bhopaal ०५.०७.०९]
Saturday, 27 June 2009
बिनु पानी सब जग घबराए !
ताल तलैया पोखर सूखे
कुआ बाबडीसब नल भूखे
प्यासे पशुपंछी नर नारी
अधर सभी के भूखे रूखे
प्यास निगोड़ी कंठ सुखाए !
पल पल पारा ऊपर चढ़ता
ताव धूप का खूब खौलता
बदनाम हुआ छाया का यश
धरा गगन अंगार उगलता
सुबह शाम ढीला पर जाए !
बुरी खबर है अलनौनों की
हालत खस्ता है खेतों की
भूख प्यास की चिंता दुगनी
फसल उग रही रोगों की
मानसून सबको उलझाए !
[भोपाल:२६.०६.०९]
कुआ बाबडीसब नल भूखे
प्यासे पशुपंछी नर नारी
अधर सभी के भूखे रूखे
प्यास निगोड़ी कंठ सुखाए !
पल पल पारा ऊपर चढ़ता
ताव धूप का खूब खौलता
बदनाम हुआ छाया का यश
धरा गगन अंगार उगलता
सुबह शाम ढीला पर जाए !
बुरी खबर है अलनौनों की
हालत खस्ता है खेतों की
भूख प्यास की चिंता दुगनी
फसल उग रही रोगों की
मानसून सबको उलझाए !
[भोपाल:२६.०६.०९]
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